Psychosomatic Disorder (Mansik Santulan)
psychosomatic disorder (Mansik Santulan) kya hai?
बीमार नहीं हैं, फिर भी डरते हैं। कोई बीमारी तो नहीं हो गई? यह सोच तनाव और अवसाद को जन्म देता है। यहां से शुरू होती है मानसिक संतुलन के लड़खड़ाने की प्रक्रिया।
जिदगी है, तो सुख-दुख है। समस्याएं हैं। समस्याओं और परेशानियों में घिरे रहना यानी तनाव, चिंता और अवसाद को बढ़ाना। जो लोग परेशानियों और समस्याओं को हंसते हुए स्वीकार करते हैं, वे स्वस्थ जीवन जीते हैं। जो ऐसा करने में असफल होते हैं, उनकी जिंदगी तनाव युक्त और चिंता ग्रस्त रहती है। यहीं से जन्म लेती हैं कई तरह की बीमारियां। कुछ लोग 'बीमारी' शब्द सुनते ही घबरा जाते हैं। सच तो यह है कि ये बीमारियां भी जीवन की अन्य समस्याओं की तरह ही एक अभिन्न हिस्सा हैं, जिससे चाहकर भी आप बच नहीं सकते। प्रदूषण, मिलावटी भोजन और व्यक्ति की बढ़ती औसत आयु के कारण आज लोग कैंसर, हार्ट अटैक, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, थायरॉएड, गर्दे से संबंधित रोग के शिकार हो रहे हैं। ये कुछ ऐसी बीमारियां हैं, जिनके बारे में सुनकर कुछ लोगों का मानसिक संतुलन गड़बड़ाने लगता है। लोग चिंता और अवसाद से घिर जाते हैं।
ध्यान बीमारी के उपचार एवं समाधान के मुकाबले बीमारी पर ही केंद्रित रहता है। उपचार के लिए निर्णय की क्षमता भी प्रभावित हो जाती है। कोशिश यह करें कि बीमारी की चिंता को अपने ऊपर हावी न होने दें। मानसिक संतुलन एवं धैर्य बनाए रखें। अपनी सोच को बदलें। इसके लिए जरूरी है अपने मस्तिष्क एवं सोच को नियंत्रण में रखने की, उसे तरोताजा बनाए रखने की, क्योंकि विचार एवं सोच मस्तिष्क में ही विकसित होते हैं। मानव मस्तिष्क एक सुपर कंप्यूटर की तरह है। जिस प्रकार आप अपने कंप्यूटर को समय-समय पर रिफ्रेश करते रहते हैं, उसी प्रकार अपने मस्तिष्क की सोच, मानसिक संतुलन और धैर्य बनाए रखने के लिए इसे रिफ्रेश या तरोताजा रखने की जरूरत होती है। मस्तिष्क जब ठीक से काम नहीं करता, तब वह कई सारी समस्याओं को महसूस करता है। इससे मस्तिष्क के कारण शरीर में होने वाली बीमारियों जैसे सायकोसोमेटिक डिसऑर्डर्स होने की संभावना बढ़ जाती है। सायको यानी मस्तिष्क एवं सोमेटिक यानी शरीर। कई तरह की सायकोसोमेटिक बीमारियां हैं, जैसे पेप्टिक अल्सर, एलर्जी, त्वचा एवं श्वसन संबंधी एलर्जी जैसे दमा आदि। जो लोग अधिक चिंतित एवं तनाव ग्रस्त रहते हैं, उनमें आमतौर पर ये बीमारियां अधिक देखने को मिलती हैं। मधुमेह, उच्च नसे रक्तचाप और हृदय रोग भी मस्तिष्क के तनाव एवं से चिंता ग्रस्त होने के कारण होती हैं, इसलिए इन्हें भी सायकोसोमेटिक बीमारियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। हाल के अध्ययनों से यह साबित हुआ है, कि लंबे समय तक चिंता एवं तनाव युक्त रहना, कुछ प्रकार के कैंसर का भी एक मुख्य कारण हो सकता है। ऐसी स्थिति में पहुंचने से पहले ही आप है। अपने मस्तिष्क को तरोताजा करें। इसका आसान उपाय है ध्यान (मेडिटेशन)। ध्यान मस्तिष्क को युवा बनाने या पुनरोत्थान करने में मदद करता है। यद्यपि ध्यान योगा का हिस्सा है, लेकिन योगा ध्यान के बिना मस्तिष्क को तरोताजी बनाने में मददगार नहीं होता है। योगा, मस्तिष्क सहित शरीर के सभी आन्तरिक अंगों की ऑक्सीजन की आपूर्ति को बढ़ाता है, जिससे उन्हें स्वस्थ रहने में मदद मिलती ध्यान से मस्तिष्क को जवां और स्वस्थ बनाए रख सकते हैं। ध्यान एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मस्तिष्क विचारों को व्यवस्थित करना सिखाता है, ताकि मस्तिष्क शांत चित्त अवस्था में पहुंच सके। हमारा मस्तिष्क बहुत सारी पुरानी यादों से भरा रहता है। विशेष रूप से बुरी यादें, जो मस्तिष्क में ज्यादा लम्बे समय तक रहती हैं। हर यादें मस्तिष्क पर एक कभी न खत्म होने वाला असर छोड़ जाती हैं, चाहे अच्छी हो या खराब। अतः यह आवश्यक है कि अपने मस्तिष्क को खुश एवं स्वस्थ रखने के लिए पुरानी यादों को मस्तिष्क से निकाल दें। ध्यान से तनाव कम होता है। जो लोग ध्यान करते हैं, उनके अंदर जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया उत्पन्न होता है। यह जीवन में संतुलन, शांति एवं साफ-सुथरा रहने का भाव लाता है। ध्यान आपको, आपके विचारों के प्रति जागरूक करने एवं व्यक्ति की सकारात्मक भावनाओं को बाहर निकालने का द्वार खोलता है। व्यक्ति को सभी ऊर्जा के स्रोत से जोड़ता है। ध्यान के अभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में एक विशेष चिन्ह पर अपने मस्तिष्क को केंद्रित करना चाहिए। किसी वस्तु, छाया चित्र या ऊं की आकति या ऐसे पॉइंट, जो दो या तीन गोलाकार से घिरा हो, उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मस्तिष्क में विचारों को न आने देना या विचारों के प्रवाह को रोकना आसान नहीं होता है। ध्यान के रोजाना अभ्यास से आप ऐसी अवस्था में पहुंच जाते हैं, जहां पर आप आसानी से बिना किसी बाधा के अपने मस्तिष्क को एक जगह पर केंद्रित एवं एकाग्रचित कर सकते हैं। जिस स्थिति में एक विशेष समय के लिए आपके मस्तिष्क में कोई विचार नहीं आता है, जो आपको विचार शून्यता या विचारों से मुक्त वाली स्थिति में पहुंचा देता है। ऐसी स्थिति को नो माइंड मेडिटेशन या मस्तिष्क विहीन ध्यान भी कहते हैं। ऐसी स्थिति में आप विचारों से मुक्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति गहरी निद्रा वाली स्थिति होती है, जिसमें न कोई स्वप्न आता है और न ही कोई विचार। यह का आसान स्थिति समाधि भी कहलाती है। शोध में पाया गया है स्तिष्क को कि जो लोग प्रतिदिन ध्यान का अभ्यास करते हैं, करता है। उनमें अल्जाइमर एवं सेरेब्रल डिमेन्शिया (मस्तिष्क योगा ध्यान का आकार घटना) नामक बीमारियों के होने की में मददगार संभावना काफी कम रहती है। ध्यान, मस्तिष्क से र के सभी नकारात्मकता को निकालकर इसे तरोताजा, स्वस्थ, आपूर्ति को खुश एवं शांत बनाता है। यदि आप भी रोजाना योगा एवं ध्यान करते हैं, तो कई तरह के रोगों से खुद को बनाए रख बचाए रख सकते हैं।
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